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इतिहास के पन्ने -- शिव जांगिड

 क़िले व महल युक्त इस नगर की स्थापना 1611 ई. में एक राजपूत किशन सिंह  ने की थी। यह भूतपूर्व किशनगढ़ रियासत की राजधानी था, जो 1948 ई. में राजस्थान का हिस्सा बना। 
 यदपि किशनगढ़ एक राजपूत रियासत थी परन्तु इस का इतिहास मेवाड और मारवाड की तरह गौरव शाली 
और   संघर्ष पूर्ण नहीं रहा है , महाराणा प्रताप ,दुर्गादास और अमर सिंह जेसे वीर पुरुषों का किशनगढ़ के इतिहास में  आभाव है ,
आरम्भ  से ही किशनगढ़ रियासत ने संघर्ष के बजाय  सुलह और सहयोग की निति को अपनाया|
मुग़ल  काल से अग्रेजो के समय तक यहाँ शासको ने प्रतिरोध निति का अनुसरण नहीं किया 

राजस्थान के अजमेर जिले में हजारों वर्षों से पूजनीय तीर्थराज पुष्कर के अंचल का किशनगढ़ सैंकड़ों वर्षों से राजपूत चित्र शैली से विख्यात है। यहां के शासक सांवतसिंह की एक प्रेमिका बणी ठणी का चित्र राजा के चित्रकार मोरध्वज ने बनाया था। वह चित्र राजा को पसंद आया। उसी बणी ठणी के नाम से यह चित्र शैली प्रसिद्ध हुई।
    इस चित्र शैली की मांग देश ओर विदेश में बहुत है। वर्तमान युग में जहां साज सज्जा के तरीकों में बहुत बदलाव आ गया है, लेकिन इस पुरातन शैली के चित्रों से साज सज्जा करना बढ़ता जा रहा है। वर्षों से किशनगढ़ शैली में चित्रकारी करने में सिद्धहस्त किशनगढ़ वासी महावीर शर्मा  ने बताया कि इस चित्रशैली की सज्जा आवासीय भवनों में व बड़े बड़े होटलों में स्वागत कक्ष से शयन कक्ष तक की जाने का प्रचलन बढ़ रहा है। गैलरी में और सामान्य घरों तक की बैठकों में इस शैली के चित्र सजाए जाते हैं। सरकारी विश्राम गृहों सर्किट हाऊसों और पर्यटन विभाग के बंगलों व भवनों में इस शैली के चित्रों से की गई साज सज्जा देखते ही बनती है।
    इस शैली के चित्र कागज व  सिल्क कपड़े पर की जाती है।  लक्कड़ी पर आलमारी, बैड, टेबल-चेयर, सजावट के कॉर्नर पर यह चित्र शैली खूब सुंदर लगती है। संगमरमर पर इसका आकर्षण लाजवाब होता है। लोहे के सामान छोटे मोटे बॉक्स, बैंगल बॉक्स,मटके आदि पर भी इसकी सजावट करने का प्रचलन है। कांच पर भी यह चित्रकारी की जाती है। धार्मिक स्थलों में मंदिरों व धर्मशालाओं आदि में भी इस चित्र शैली की फूल पत्तियां बनवाने का प्रचलन है

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