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सुनहरी धुप में रंगों की बातें करती थी -- शिव जांगिड


सुनहरी धुप में ,
रंगों की बातें करती थी !
बात बे बात हंसती थी ,
वहां कोई बसता हो जैसे ,
आसमान को देर तलक ऐसे तकती थी !!
जुगनू से , तितली से ,
साहिल से , तारों से ,
बारिश के पानी से ,
मोजों की रवानी से ,
बे- हद वो प्यार करती थी !
चंदा पे जो मरती थी ?
रात गयी, खिड़की में खड़ी ,
फलक से बातें करती थी ,




बेअसर कुछ ऐसे , रातें करती थी
बारिश में भीगने का शोक था उसको
कह्किशों पे बसने का जोग था उसको
नहीं ये हाजत पुरानी कोई
ना है खुश गुमानी कोई
मगर अब लगता है ऐसा
सच है पर इक झूठ के जैसा
मेरे अन्दर एक लड़की बसती थीचंदा पे जो मरती थी
जाने कहा वो खो गयी थी
कुछ मसरूफ हो गयी थी
इक मुद्दत से जो , खामोश जो रहती थी !
वो ही तो थी जो कभी मुझपे भी मरती थी !
सुनहरी धुप में रंगों की बातें करती थी

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